संन्यासी शब्द सुनते ही हमारे मन में भगवे कपड़े, लम्बी दाढ़ी-बाल वाले चेहरे की कल्पना आती है। लेकिन भगवद् गीता के अनुसार संन्यासी कपड़े या चेहरे से नहीं, गुणों और संयम से बन सकते हैं। अगर हम संन्यासी के कपड़े पहनकर इन्द्रियों पर काबू नहीं पा सकते तो कपड़े का कोई महत्त्व नहीं है। अगर हमें धन-दौलत-गाड़ी-बंगला से प्यार है ...
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